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गहलौर का माउंटेन मैन: दशरथ मांझी की प्रेम और समर्पण की अद्भुत कहानी जिसने पहाड़ चीरकर रास्ता बना दिया

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गहलौर के माउंटेन मैन की कहानी भारत और दुनिया के लिए प्रेरणा का प्रतीक है। वैलेंटाइन डे पर प्रेम का जश्न मनाया जाता है लेकिन गहलौर की यह कहानी दिखाती है कि सच्चा प्यार केवल शब्दों और फूलों में नहीं, बल्कि त्याग, समर्पण और कर्म में भी व्यक्त होता है। यह कहानी है दशरथ मांझी की, जिन्हें माउंटेन मैन कहा जाता है। एक गरीब मजदूर जिसने अपने जीवन की सबसे बड़ी चुनौती को स्वीकार किया और अपनी पत्नी के प्रति प्रेम और समर्पण के लिए 22 साल तक पहाड़ काटता रहा। यह कहानी किसी रोमांटिक कहानी जैसी नहीं है बल्कि यह साहस, अडिग संकल्प और समाज सेवा की मिसाल है। दशरथ मांझी की पत्नी फाल्गुनी देवी गहलौर गांव में खाना लेकर जा रही थीं, तभी रास्ते में फिसलकर गंभीर रूप से घायल हो गईं। अस्पताल तक पहुंचने में विलंब के कारण उनकी मृत्यु हो गई। यह हादसा दशरथ मांझी के लिए पूरी जिंदगी का सबसे बड़ा सदमा था। उन्होंने ठान लिया कि अब कोई और इस गांव में ऐसी पीड़ा न झेले। उन्होंने यह निर्णय किया कि गांव और शहर के बीच का रास्ता सुरक्षित और आसान बनाया जाएगा ताकि भविष्य में कोई जीवन संकट में न पड़े। इसके बाद दशरथ मांझी ने छेनी और हथौड़ी उठाई और अकेले ही पहाड़ काटने की प्रक्रिया शुरू कर दी। शुरुआत में गांव के लोग उन्हें पागल कहकर नकारात्मक टिप्पणियों से घेरते रहे लेकिन दशरथ मांझी का अडिग संकल्प और अथक मेहनत देखकर धीरे-धीरे सभी प्रभावित हुए। उन्होंने लगातार 22 साल तक अपने जीवन को इस कार्य के लिए समर्पित किया। कठिनाई, थकान, बारिश, गर्मी और सामाजिक अवरोधों के बावजूद उनका हौसला नहीं टूटा। दशरथ मांझी ने लगभग 360 फुट लंबा, 30 फुट चौड़ा और 25 फुट ऊंचा पहाड़ी मार्ग खोदकर गहलौर और वजीरगंज के बीच की दूरी को 55 किलोमीटर से घटाकर सिर्फ 15 किलोमीटर कर दिया। इस मार्ग के बनने से हजारों ग्रामीणों को जीवन की बुनियादी सुविधाओं जैसे अस्पताल, स्कूल और बाजार तक पहुँचने में सुविधा मिली। यह मार्ग केवल भौतिक दूरी को कम करने का माध्यम नहीं बल्कि समाज के लिए प्रेरणा का प्रतीक बन गया। इतिहास में जहां मुगल बादशाह शाहजहां ने अपनी पत्नी मुमताज महल की याद में ताजमहल बनवाया, वहीं एक गरीब मजदूर ने अपनी पत्नी की याद में पहाड़ काटकर एक मार्ग बना दिया। यह तुलना दशरथ मांझी की कहानी को और भी प्रेरक बनाती है और बताती है कि प्रेम का असली माप केवल शब्दों में नहीं बल्कि कर्म, त्याग और अडिग निश्चय में छिपा होता है। आज गहलौर में दशरथ मांझी की प्रतिमा स्थापित है। वैलेंटाइन डे पर बड़ी संख्या में युवा और प्रेमी जोड़े यहां आते हैं और उनकी कहानी से प्रेरणा लेते हैं। वे प्रतिमा के सामने जाकर सच्चे प्रेम और त्याग की इस मिसाल को देखते हैं, तस्वीरें खींचते हैं और अपने जीवन में इसे लागू करने की प्रेरणा पाते हैं। दशरथ मांझी के बेटे भगीरथ मांझी कहते हैं, “पिता ने जो किया वह केवल अपनी पत्नी के प्रति प्रेम और समर्पण का परिणाम था। उन्होंने दिखाया कि प्रेम इंसान को कठिन से कठिन बाधाओं को पार करने और समाज के लिए कुछ महान करने की प्रेरणा दे सकता है।” यह कहानी केवल प्रेम की नहीं बल्कि संघर्ष और समाज सेवा की भी मिसाल है। दशरथ मांझी की कहानी यह सिखाती है कि सच्चा प्रेम कर्म में निहित होता है, और अगर इंसान अपने लक्ष्य और उद्देश्य के प्रति सच्चा है तो कोई भी बाधा उसे रोक नहीं सकती। गहलौर का वह मार्ग आज भी दशरथ मांझी के साहस, प्रेम और समर्पण की याद दिलाता है और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। यह मार्ग यह बताता है कि प्यार केवल शब्दों और प्रतीकों में नहीं बल्कि कार्य, समर्पण और सेवा में व्यक्त होता है। वैलेंटाइन डे के इस अवसर पर दशरथ मांझी की कहानी हर युवा, हर प्रेमी और हर समाजसेवी के लिए प्रेरक संदेश लेकर आती है कि असली प्रेम वही है जो कठिनाई, त्याग और समाज के लिए समर्पण में दिखाई दे। दशरथ मांझी ने दिखाया कि प्रेम की ताकत इंसान को असंभव को संभव करने की क्षमता देती है और यही कारण है कि उनकी कहानी आज भी गहलौर और पूरी दुनिया में लोगों के लिए एक प्रेरक उदाहरण बन चुकी है।

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